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Monday, October 26, 2020
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भारत रत्न प्रणब मुखर्जी 1935 -2020 का राजनीतिक सफर, जानिए क्यों 1986 में हुए थे कांग्रेस से अलग

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डिजिटल डेस्क। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का दिल्ली में सेना के रिसर्च एवं रेफरल अस्पताल में निधन हो गया। वे 85 वर्ष के थे और मस्तिष्क की सर्जरी के लिए 10 अगस्त 2020 को भर्ती हुए थे। सर्जरी के बाद उन्हें लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम पर रखा गया था। इसके पहले उनकी कोरोना संक्रमण की रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई थी। पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी के परिवार में दो बेटे और एक बेटी हैं।डॉ। प्रणब मुखर्जी ने पश्चिम बंगाल के गांव मिरिटी में 11 दिसंबर 1935 को जन्म लिया था। कांग्रेस के दिग्गज़ नेताओं में वे शुमार रहे हैं। अपनी सोच-समझ से कई बार प्रणब मुखर्जी ने विरोधियों के भी हौंसले पस्त किए हैं। जब वे सक्रिय राजनीति में थे, तब उन्हें ‘कांग्रेस के संकटमोचक’ के नाम से जाना जाता था। प्रणब मुखर्जी ने वीरभूम के सूरी विद्यासागर कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की थी। बाद में उन्होंने कोलकाता यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में एमए और एलएलबी की डिग्री प्राप्त की। इतना ही नहीं प्रणब मुखर्जी ने पत्रकारिता में भी हाथ आजमाया है। 1969 में बांग्ला कांग्रेस में शामिल होने के साथ ही उनके राजनीतिक करियर का आगाज हो गया। उस समय तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की नजर उन पर पड़ीं और फिर यहीं से हो गई भारत के एक बेहतरीन व्यक्तित्व और राजनेता की शुरुआत हुई।

प्रणब मुखर्जी का सियासी सफर

प्रणब मुखर्जी सियासी गलियारे में प्रणब दा के नाम से पुकारे जाते हैं। यूपीए सरकार में प्रणब मुखर्जी के पास वित्त मंत्रालय संभालने के अलावा कई अहम जिम्मेदारियां थीं। उन्हें कांग्रेस के के लिए ‘संकटमोचक’ कहा जाता था। प्रणब मुखर्जी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बांग्ला कांग्रेस से की थी। जुलाई 1969 में वे पहली बार राज्यसभा के लिए चुने गए। इसे बाद वे साल 1975, 1981, 1993 और 1999 में राज्य सभा के सदस्य रहे। इसके अलावा 1980 से 1985 तक राज्य में सदन के नेता भी रहे। मई 2004 में वे चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे और 2012 तक सदन के नेता रहे।

1986 में कांग्रेस से हो गए थे अलग

1986 में प्रणब दा को कांग्रेस छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था। इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रणब मुखर्जी को पार्टी में किनारे करते हुए कैबिनेट से बाहर कर दिया गया था। इस सब से नाराज होकर प्रणब मुखर्जी ने 1986 में कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बनाई थी।

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1987 में पश्चिम बंगाल का चुनाव लड़ा, हारे और फिर कांग्रेस में शामिल
प्रणब मुखर्जी की पार्टी ने 1987 में पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन पहले चुनाव में ही उनकी पार्टी को बुरी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद प्रणब मुखर्जी ने 1988 में कांग्रेस में दोबारा वापसी कर ली। मुखर्जी को कांग्रेस में दोबारा वापसी का इनाम जल्द ही मिला और उन्हें नरसिम्हा राव की सरकार में 1991 में योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया।

2004 में पीएम के दावेदार रहे, मनमोहन सरकार में निभाई अहम जिम्मेदारियां

2004 में सोनिया गांधी ने जब पीएम बनने से मना कर दिया था, तो प्रणब मुखर्जी का नाम भी प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में शामिल हुआ। प्रणब मुखर्जी को मनमोहन सिंह की सरकार में रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और वित्त मंत्री जैसे अहम पद मिले। 2012 में प्रणब मुखर्जी को कांग्रेस ने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया और वो एनडीए समर्थित पी।ए। संगमा को हराकर देश के 13वें राष्ट्रपति बने।

जब राष्ट्रपति बने प्रणव दा

केंद्र की राजनीति में दशकों का सफर तय करने के बाद प्रणब मुखर्जी 5 साल पहले भारत के राष्ट्रपति के तौर पर चुने गए थे। 25 जुलाई 2012 को उन्होंने देश के 13वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली थी।

यह भी पढ़ेभारत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का 84 साल की उम्र में निधन, ट्वीट कर बेटे ने दी जानकारी

जब भारत रत्न से सम्मानित हुए प्रणब ‘दा’

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डॉ। प्रणब मुखर्जी को भारत के सबसे उंचें राष्ट्रीय सम्मान ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया गया है। साल 2019 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों ‘प्रणब दा’ को ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया। जबकि इससे पहले प्रणब मुखर्जी को देश का दूसरा सबसे ऊंचा राष्ट्रीय सम्मान पद्म विभूषण भी प्रदान किया गया था।


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